विया टेक्नोलाजीज ने छोटे आकार के पर्सनल कम्प्यूटर, डिजीटल मनोरंजन और नेटवर्क के उत्पादों में विंडो विस्ता से चलने वाला विया इपीआईए एसएन मदरबोर्ड लांच किया है। इसकी एक खास विशेषता यह है कि इसमें कम बिजली की खपत होती है एवं यह आवाज भी कम करता है।
इस नये आधुनिक 1.8 गिगार्हज स्पीड वाले सी 7 प्रोसेसर नेटवर्क, डिजीटल साईनबोर्ड और अन्य तकनीक उत्पादों को लेकर प्रसिद्ध है। कंपनी माइक्रोस्फोट के विस्ता साफ्टवेयर के उपयुक्त है। हर कंप्यूटर में कूलिंग पंखे लगे होते है। कंप्यूटर के आधुनिकरण से उन्हें ठंडा करने में आसानी होती है।
कंपनी के उपाध्यक्ष डेनियल वू के अनुसार विश्व भर में कंप्यूटरों के आकार कम हो रहे हैं। हमारे इस उत्पाद से लोगों को काफी आसानी होगी। इसमें पंखे नहीं होने के कारण बिजली की भी बचत होगी तथा ध्वनि भी कम होगी।
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें :
VIA Technologies, Inc
New Delhi
V.K.Arora Ph 09811153833
Tuesday, September 18, 2007
Friday, September 14, 2007
उडिया साहित्य के जनक को भुला दिया गया है

उन्हें उस आंदोलन का सूत्रपात करने का श्रेय जाता है जिसने भाषायी आधार पर देश में पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ किया। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक कहे जाने वाले इस शख्स की विरासत आज उपेक्षा की मार झेल रही है। आधुनिक उडिया साहित्य के जनक और भाषायी आधार पर देश में प्रथम राज्य के गठन की राह बनाने वाले फकीर मोहन सेनापति का पुश्तैनी घर और बगीचा उपेक्षा की मार झेल रहा है।
शोधकर्ताओं और साहित्य प्रेमियों का मानना है कि फकीर मोहन सेनापति की विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने की गंभीर कोशिश नहीं हो रही है। आधुनिक उडिया समाज में फकीर मोहन को व्यासकवि के नाम से भी जाना जाता है। १८४३ में जन्मे व्यासकवि ने १९१८ में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। जब फकीर मोहन डेढ वर्ष के थे, उनके पिता का निधन हो गया था। फकीर मोहन ने 'मो मातृभाषा मोते श्रेष्ठ' (मेरी मातृभाषा मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ है) का उद्घघोष किया था। उनके इसी इजहार से देश में भाषा के नाम पर पहली बार किसी राज्य के गठन का रास्ता साफ हुआ। १९३६ में उडीसा का भाषायी आधार पर गठन हुआ। व्यासकवि को उडिया पुनर्जागरण का सूत्रपात करने वाले लोगों में से एक माना जाता है।
जिस व्यासकवि ने अपने साहित्यिक अवदान से अपने समाज की इतनी सेवा की, आज उनकी विरासत खतरे में है। राजधानी भुवनेश्वर से २०० किलोमीटर दूर बालासोर जिले के मलिकाशपुर गांव में उनके घर की जिस कदर उपेक्षा हो रही है, वह बेहद दुखद है। उन्होंने लोगों में आत्मसम्मान की भावना फैलाने में कोई कसर नहीं छोडी थी, लेकिन आज उनकी विरासत खतरे में है। उनके जीर्ण-शीर्ण घर को जिस तरीके से पुस्तकालय, म्यूजियम के रूप में तब्दील किया गया है, वह हास्यास्पद है। वर्षों तक उनका यह घर उपेक्षा की मार झेलता रहा और जब उसकी मरम्मत की गयी और उसकी शक्ल बदली गयी तो मौलिकता ही गायब हो गयी। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि यह परिसर उनकी याद में समर्पित नहीं है। इसकी मूल पहचान खत्म हो गयी है और इसमें कुछ देवताओं की प्रतिमाएं लगा दी गयी हैं। कहीं से भी देखने से नहीं लगता कि यह व्यासकवि का घर है।
व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति आधुनिक उड़िया कथा-साहित्य के जनक माने जाते हैं। उनकी कहानी तत्कालीन साहित्यिक पत्रिका ‘बोधदायनी’ में छपी थी। दुर्भाग्यवश वह पत्रिका और ‘लछमनिया’ कहानी भी आज इतिहास के गर्भ में समा गयी हैं।
लोगों का कहना है कि इस घर की जिस हास्यास्पद तरीके से मरम्मत की गयी है, वह अपने आपमें एक मिसाल है कि कैसे देश का सांस्कृतिक विभाग काम कर रहा है। घर के कई स्थानों से पानी का रिसाव दूर से ही देखा जा सकता है। यही हाल उनके गार्डन का है। यहां कई जगह सुंदर नक्काशी की गई थी जो आज गायब हो चुकी है। इस गार्डन की देखभाल के लिए एक माली नियुक्त किया गया था, लेकिन फिलहाल इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। इससे यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि राज्य प्रशासन इस साहित्य हस्ती की विरासत के संरक्षण के प्रति गंभीर नहीं है।
Wednesday, September 12, 2007
कंप्यूटर के क्षेत्र में एक नया प्रयोग...........
पर्सनल कंप्यूटर निर्माता OQO " UPMC मॉडल 02 " बाजार में उतारेगी
पर्सनल कंप्यूटर का उपयोग करने वाले के लिए यह एक खुशखबरी की तरह है। मात्र 450 ग्राम वजन वाला पर्सनल कंप्यूटर अब बाजार में आने वाला है। यह सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस होगा। यह 1.4 AMBPS की गति से काम करेगा।
इसमें आप 120 जीबी तक बढ़ा कर अपना काम आगे बढ़ा सकते हैं। यह इसकी सबसे बड़ी खूबी होगी। दरअसल क्षमताओं को आगे बढ़ाना पर्सनल कंप्यूटर का सबसे बड़ा काम होता है।
मॉडल 02 का नया रूप मोबाईल पेशेववरों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। खासकर इंटरनेट और अन्य सुविधाओं को लेकर उत्सुक लोगों के लिए कंपनी यह सबसे रोचक काम करने जा रही है।
VIA का यह अवार्ड विजेता संस्करण लोगों को बेहद पसंद आएगा। कंपनी के उपाध्यक्ष (कॉरपोरेट मार्केटिंग) रिचर्ड ब्राउन ने बताया कि हमें इस बात की खुशी है कि अब इस प्रकार के कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होने कहा कि इस प्रकार के मॉडल काफी लोकप्रिय साबित होंगे।
OQO के विपणन और गठबंधन के वरिष्ट उपाध्यक्ष बॉब रॉसिन कहते हैं कि यह मोबाइल पेशेववरों के लिए यह मॉडल उपयोगी साबित होगा। इसमें एक साथ कई खूबियां हैं।
जानकारी के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं-
http://www.ultramobilelife.com/index.php?option=com_content&task=view&id=496
Technologies, Inc
Contact V।K.Arora : 9811153833
पर्सनल कंप्यूटर का उपयोग करने वाले के लिए यह एक खुशखबरी की तरह है। मात्र 450 ग्राम वजन वाला पर्सनल कंप्यूटर अब बाजार में आने वाला है। यह सभी अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस होगा। यह 1.4 AMBPS की गति से काम करेगा।
इसमें आप 120 जीबी तक बढ़ा कर अपना काम आगे बढ़ा सकते हैं। यह इसकी सबसे बड़ी खूबी होगी। दरअसल क्षमताओं को आगे बढ़ाना पर्सनल कंप्यूटर का सबसे बड़ा काम होता है।
मॉडल 02 का नया रूप मोबाईल पेशेववरों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। खासकर इंटरनेट और अन्य सुविधाओं को लेकर उत्सुक लोगों के लिए कंपनी यह सबसे रोचक काम करने जा रही है।
VIA का यह अवार्ड विजेता संस्करण लोगों को बेहद पसंद आएगा। कंपनी के उपाध्यक्ष (कॉरपोरेट मार्केटिंग) रिचर्ड ब्राउन ने बताया कि हमें इस बात की खुशी है कि अब इस प्रकार के कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होने कहा कि इस प्रकार के मॉडल काफी लोकप्रिय साबित होंगे।
OQO के विपणन और गठबंधन के वरिष्ट उपाध्यक्ष बॉब रॉसिन कहते हैं कि यह मोबाइल पेशेववरों के लिए यह मॉडल उपयोगी साबित होगा। इसमें एक साथ कई खूबियां हैं।
जानकारी के लिए आप इस लिंक पर जा सकते हैं-
http://www.ultramobilelife.com/index.php?option=com_content&task=view&id=496
Technologies, Inc
Contact V।K.Arora : 9811153833
Monday, September 10, 2007
हे सडक देवता हमारी रक्षा करना!
अगर मंगलवार के दिन आप आगरा की सडकों पर घूमने निकलें तो महिलाओं को सडक पर पूजा करते देख आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दरअसल, ताज नगरी आगरा में सडकों की पूजा की प्रवृत्ति इन दिनों जोर पकड रही है। लोग यात्रा पर निकलने से पहले सडक हादसे से बचने के लिए कुमकुम, पेडा, चंदन, फूल आदि से सडक की पूजा करते हैं।
सडक पर जुटने वाली महिलाएं सडक देवता से अपने संबंधियों की प्राण रक्षा की प्रार्थना करती हैं। ये महिलाएं अपने संबंधियों सडक हादसे से बचने के लिए सडक की पूजा करती हैं। उन्हें विश्वास है कि इससे सडकों पर उनके परिजनों व उनकी रक्षा होगी। खासकर कुछ हालिया सडक हादसों के बाद यहां सडक की पूजा की प्रवृत्ति अधिक जोर पकडने लगी है। ग्वालियर रोड के नजदीक रहने वाली सरोज का कहना है कि हर रोज मंगलवार की सुबह उनकी जैसी कुछ महिलाएं इस हाईवे पर आती हैं और सडक को धोकर वहां फूल, चंदन आदि से पूजा करती हैं। सडक की एक छोटी पट्टी को पवित्र जल से धोने के बाद वहां स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है और सडक देवता को कुमकुम, पेडा, चंदन, फूल आदि से पूजा जाता है। यहां जुटने वाली महिलाएं सडक देवता से अपने संबंधियों की प्राण की रक्षा की प्रार्थना करती हैं।
ऐसा नहीं है कि ग्वालियर रोड पर ही ऐसा नजारा देखा जाता है। शहर के नहराइच, रतनपुरा और यहां तक कि कमला नगर जैसी पॉश कॉलोनियों में भी महिलाओं को सडक की पूजा करते देखा जाता है। यहां तक कि हाईवे के किनारे स्थित गांव के लोग भी सडक पूजा में आस्था रखने लगे हैं। यहां के हिन्दू पुजारियों का कहना है कि अगर यातायात पुलिस लोगों की सुरक्षा के लिए पुख्ता कदम नहीं उठा सकती है तो हम भगवान से प्रार्थना क्यों न करें। पुलिस के मुताबिक ताजमहल की नगरी आगरा में रोजाना कम से कम एक सडक हादसा जरूर होता है जिनमें से ५० फीसदी हादसे भुक्तभोगी के लिए जानलेवा साबित होते हैं। १९८५ में जहां आगरा में महज ४० हजार वाहन हुआ करते थे, आज उनकी संख्या बढकर ४ लाख हो गयी है। एक गृहिणी पुष्पा झा को हर मंगलवार को सडक की पूजा करते देखा जा सकता है। उसका कहना है कि अगर ऐसा करने से मेरे पति की रक्षा होती है तो मैं ऐसा क्यों न करूं?
लोग यात्रा पर निकलते समय कई अन्य तरह के टोटके भी करते हैं। यदि कोई व्यक्ति यात्रा पर निकल रहा हो और बिल्ली रास्ता काट जाए या खाली बाल्टी या बरतन दिख जाए तो वह कुछ देर के लिए वापस आ जाता है। घर में उसे कुछ पानी पीने को दिया जाता है तथा माथे पर राख का टीका लगवा कर पुन: यात्रा पर निकलता है।
सडक पर जुटने वाली महिलाएं सडक देवता से अपने संबंधियों की प्राण रक्षा की प्रार्थना करती हैं। ये महिलाएं अपने संबंधियों सडक हादसे से बचने के लिए सडक की पूजा करती हैं। उन्हें विश्वास है कि इससे सडकों पर उनके परिजनों व उनकी रक्षा होगी। खासकर कुछ हालिया सडक हादसों के बाद यहां सडक की पूजा की प्रवृत्ति अधिक जोर पकडने लगी है। ग्वालियर रोड के नजदीक रहने वाली सरोज का कहना है कि हर रोज मंगलवार की सुबह उनकी जैसी कुछ महिलाएं इस हाईवे पर आती हैं और सडक को धोकर वहां फूल, चंदन आदि से पूजा करती हैं। सडक की एक छोटी पट्टी को पवित्र जल से धोने के बाद वहां स्वास्तिक का चिन्ह बनाया जाता है और सडक देवता को कुमकुम, पेडा, चंदन, फूल आदि से पूजा जाता है। यहां जुटने वाली महिलाएं सडक देवता से अपने संबंधियों की प्राण की रक्षा की प्रार्थना करती हैं।
ऐसा नहीं है कि ग्वालियर रोड पर ही ऐसा नजारा देखा जाता है। शहर के नहराइच, रतनपुरा और यहां तक कि कमला नगर जैसी पॉश कॉलोनियों में भी महिलाओं को सडक की पूजा करते देखा जाता है। यहां तक कि हाईवे के किनारे स्थित गांव के लोग भी सडक पूजा में आस्था रखने लगे हैं। यहां के हिन्दू पुजारियों का कहना है कि अगर यातायात पुलिस लोगों की सुरक्षा के लिए पुख्ता कदम नहीं उठा सकती है तो हम भगवान से प्रार्थना क्यों न करें। पुलिस के मुताबिक ताजमहल की नगरी आगरा में रोजाना कम से कम एक सडक हादसा जरूर होता है जिनमें से ५० फीसदी हादसे भुक्तभोगी के लिए जानलेवा साबित होते हैं। १९८५ में जहां आगरा में महज ४० हजार वाहन हुआ करते थे, आज उनकी संख्या बढकर ४ लाख हो गयी है। एक गृहिणी पुष्पा झा को हर मंगलवार को सडक की पूजा करते देखा जा सकता है। उसका कहना है कि अगर ऐसा करने से मेरे पति की रक्षा होती है तो मैं ऐसा क्यों न करूं?
लोग यात्रा पर निकलते समय कई अन्य तरह के टोटके भी करते हैं। यदि कोई व्यक्ति यात्रा पर निकल रहा हो और बिल्ली रास्ता काट जाए या खाली बाल्टी या बरतन दिख जाए तो वह कुछ देर के लिए वापस आ जाता है। घर में उसे कुछ पानी पीने को दिया जाता है तथा माथे पर राख का टीका लगवा कर पुन: यात्रा पर निकलता है।
Friday, September 7, 2007
प्रेमी संग रोमांस कर वापस लौटी 'सावित्री'

पिछले सप्ताह अपनी प्रेमी के संग भागी 'सावित्री' आखिरकार अपने पर लौट आई है। सावित्री उस हथिनी का नाम है जो कुछ दिन पहले एक पश्चिम बंगाल के ओलम्पिक सर्कस के परिसर से निकल कर झारखंड के एक हाथी के साथ भाग गयी थी।
रायगंज के कुमारबाजार में ओलम्पिक सर्कस के टेंट से अपने प्रेमी हाथी के साथ फरार होने वाली २६ वर्षीया हथिनी सावित्री जंगल में रोमांस के बाद अब वापस लौट आई है। २९ अगस्त की रात्रि को यह प्रेम दीवानी हथिनी झारखंड के एक हाथी के साथ भाग गयी थी। एक सप्ताह तक हाथी के साथ मौज-मस्ती के बाद यह हथिनी वापस लौट आई है। सर्कस के कर्मचारियों ने इस हथिनी के वापस लौटने की उम्मीद छोड दी थी, लेकिन इस हथिनी ने वापस लौट कर अपनी वफादारी का परिचय दिया।
सर्कस के कर्मचारियों की खुशी का उस वक्त ठिकाना न रहा जब सावित्री को उन्होंने बुधवार की शाम अपने प्रेमी के साथ देखा। पिछले कुछ दिनों से वन विभाग की एक टीम इस प्रेमी जोडे पर नजर रख रही थी। जब इस टीम ने इस जोडे को देख कर शोर मचाया तो हथिनी का प्रेमी वहां से फरार हो गया। बांकुरा के एक संभागीय वन अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि हमने बांकुरा के जंगल में एक तालाब के पास इस हथिनी को देखा था। हमारे कर्मचारियों ने हथिनी को चारों ओर से घेर लिया था। उसके प्रेमी को उसके समीप नहीं फटकने देने के लिए ढोल और शंख भी बजाए गए थे।
सावित्री के सामने उसके महावत कलीमुद्दीन शेख को लाया गया। सावित्री ने कलीमुद्दीन को पहचान लिया। इस महावत ने कहा कि मुझे मालूम था कि सावित्री अपने साथी से ऊब जाएगी और जल्द वापस हमारे पास लौट आएगी। उन्होंने कहा कि सावित्री कभी जंगल में रहने की आदी नहीं थी। वह कुछ ही दिनों में कमजोर हो गयी है। महावत के मुताबिक साबित्री सर्कस लौट कर खुश है क्योंकि पिछले २० वर्षों से वह इस सर्कस का हिस्सा रही है। सर्कस के कर्मचारी अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहे हैं। कर्मचारियों ने कहा कि सावित्री इस सर्कस की बेटी की तरह है और मुझे उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में साबित्री दर्शकों की भीड खींचने लगेगी। वह मेरे सर्कस की स्टार रही है। वैसे, अब इस रोमांटिक हथिनी को पहले जितनी आजादी नहीं मिलेगी और उस पर कडी निगरानी रखी जाएगी। दूसरी हथिनियों पर निगरानी भी बढा दी गयी है।
रायगंज के कुमारबाजार में ओलम्पिक सर्कस के टेंट से अपने प्रेमी हाथी के साथ फरार होने वाली २६ वर्षीया हथिनी सावित्री जंगल में रोमांस के बाद अब वापस लौट आई है। २९ अगस्त की रात्रि को यह प्रेम दीवानी हथिनी झारखंड के एक हाथी के साथ भाग गयी थी। एक सप्ताह तक हाथी के साथ मौज-मस्ती के बाद यह हथिनी वापस लौट आई है। सर्कस के कर्मचारियों ने इस हथिनी के वापस लौटने की उम्मीद छोड दी थी, लेकिन इस हथिनी ने वापस लौट कर अपनी वफादारी का परिचय दिया।
सर्कस के कर्मचारियों की खुशी का उस वक्त ठिकाना न रहा जब सावित्री को उन्होंने बुधवार की शाम अपने प्रेमी के साथ देखा। पिछले कुछ दिनों से वन विभाग की एक टीम इस प्रेमी जोडे पर नजर रख रही थी। जब इस टीम ने इस जोडे को देख कर शोर मचाया तो हथिनी का प्रेमी वहां से फरार हो गया। बांकुरा के एक संभागीय वन अधिकारी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि हमने बांकुरा के जंगल में एक तालाब के पास इस हथिनी को देखा था। हमारे कर्मचारियों ने हथिनी को चारों ओर से घेर लिया था। उसके प्रेमी को उसके समीप नहीं फटकने देने के लिए ढोल और शंख भी बजाए गए थे।
सावित्री के सामने उसके महावत कलीमुद्दीन शेख को लाया गया। सावित्री ने कलीमुद्दीन को पहचान लिया। इस महावत ने कहा कि मुझे मालूम था कि सावित्री अपने साथी से ऊब जाएगी और जल्द वापस हमारे पास लौट आएगी। उन्होंने कहा कि सावित्री कभी जंगल में रहने की आदी नहीं थी। वह कुछ ही दिनों में कमजोर हो गयी है। महावत के मुताबिक साबित्री सर्कस लौट कर खुश है क्योंकि पिछले २० वर्षों से वह इस सर्कस का हिस्सा रही है। सर्कस के कर्मचारी अपनी खुशी छिपा नहीं पा रहे हैं। कर्मचारियों ने कहा कि सावित्री इस सर्कस की बेटी की तरह है और मुझे उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में साबित्री दर्शकों की भीड खींचने लगेगी। वह मेरे सर्कस की स्टार रही है। वैसे, अब इस रोमांटिक हथिनी को पहले जितनी आजादी नहीं मिलेगी और उस पर कडी निगरानी रखी जाएगी। दूसरी हथिनियों पर निगरानी भी बढा दी गयी है।
Tuesday, September 4, 2007
जहां आसान नहीं है कब्रिस्तान में जगह पाना

जहां लोग रहने के लिए एक आशियाने की व्यवस्था करने में लंबे अरसे तक भाग-दौड करते रहते हैं वही उनकी मौत के बाद उनके दफन के लिए जमीन का छोटा टुकडा भी बडी मुश्किल से नसीब हो पाता है। यह हाल है रूस में कब्रिस्तानों का। रूसी शहरों में मुर्दों के लिए जमीन ढूंढना जिंदा इंसान के लिए घर की व्यवस्था करने से कहीं अधिक महंगा हो गया है। यहां तक कि दूरदराज के कब्रिस्तानों में मॉस्को वासियों को अपने परिजनों को दफनाने पर अमूमन ६ लाख रूबल यानी २३,४०० डॉलर खर्च करना पडता है जो एक औसत मॉस्कोवासी की पूरी साल की कमाई के बराबर है।
आम लोगों की बात तो दूर, जब इस साल बसंत ऋतु के दौरान मॉस्को के एक कब्रिस्तान में पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और संगीतकार मिस्टिस्लाव रोस्ट्रोपोविच के पार्थिव अवशेषों को दफन करने की बारी आई तो इन दोनों महान हस्तियों को भी यहां जमीन मयस्सर नहीं हुई। मॉस्को में कब्रिस्तानों में जमीन की भारी किल्लत से परेशान होकर कई लोग अपने परिजनों के शवों को दफन के बजाय अब जलाने लगे हैं। मीडिया की खबरों के अनुसार कई कब्रिस्तानों में दफन की रस्म में १००,००० से ४००,००० रूबल के बीच खर्च होता है जिसमें दिनोंदिन भारी बढोत्तरी हो रही है।
रूस के प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि नोवोदेविची या क्रेमलिन के पास स्थित कब्रिस्तानों में महान हस्तियों के पार्थिव शरीर को भी दफनाने के लिए जमीन ढूंढना आसान काम नहीं है। आम लोगों की बात ही अलग है। दूसरे प्रमुख रूसी शहरों में कब्रिस्तानों में अपने परिजनों के लिए एक टुकडा जमीन ढूंढना लोगों के लिए टेढी खीर बनता जा रहा है। यही वजह है कि इन शहरों में मुर्दों को दफनाना इतना अधिक महंगा हो ग्या है।
कब्रिस्तानों पर बढते दबाव को देखते हुए मॉस्को नगर प्रशासन ने लोगों को लाशों की अंत्येष्टि के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया है। अखबारों में इन दिनों बडे बडे विज्ञापन छपते हैं और लोगों को लाशों को चिता के हवाले कर अस्थि कलश को जमीन में दफन करने के लिए प्रेरित किया जाता है। वही दूसरी ओर इससे चर्च को ईसाइयत पर खतरा मंडराने का भी डर सताने लगा है। रसियन ऑर्थोडक्स चर्च ने मृतक ईसाइयों की अस्थियां कलश में रख कर दफन किए जाने के नए चलन को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। ऑर्थोडक्स चर्च ने इसे ईसाई-विरोधी रस्म करार दिया है।
एक आकलन के मुताबिक रूस में लाशों को जलाने का चलन अब जोर पकडने लगा है। यूरोपीय संघ के देश जर्मनी में तो करीब ५० फीसदी शवों को जलाया जाने लगा है। दफन रस्म विभाग के प्रमुख अधिकारी कहते हैं कि मॉस्को में किसी मुर्दे को मात्र आठ वर्ष या इससे कुछ अधिक समय तक के लिए ही कब्र नसीब हो सकती है। करीब ७० कब्रिस्तान तो मुर्दो से पहले ही भर चुके हैं। इनमें एक भी शव दफनाने के लिए जगह नहीं बची है। मॉस्को में ४ शवदाह केंद्र बन चुके हैं। इनकी संख्या बढाए जाने की योजना है।
Friday, August 31, 2007
हमारे नेताओं को भी अच्छी लग रही है 'चक दे इंडिया'

'चक दे इंडिया' जैसी लाजवाब फिल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा, निर्देशक शिमित अमीन, अभिनेता शाहरुख खान और इसके लेखक जयदीप साहनी को बधाई दी जानी चाहिए कि इन्होंने मिलकर हॉकी जैसे खेल पर इतनी बढिया फिल्म बनाई है. यह फिल्म आम दर्शकों के अलावा नेताओं एवं मन्त्रियों को भी बेहद पसंद आ रही है.
एक मंत्री महोदय अभिनेता शाहरुख खान की भूमिका वाली फिल्म ‘चक दे इंडिया’ की सफलता से इतने अधिक प्रभावित हैं कि वे प्रधानमंत्री को भी यह फिल्म देखने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री भी वक्त निकाल कर यह फिल्म देखेंगे। ये मंत्री महोदय हैं पीमओ में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान. उन्होने जब से यह फिल्म देखी है वे अभिभूत हैं। इस फिल्म के बारे में उनक कहना है कि यह फिल्म प्रेरणादायक है हॉकी खेल में जान फूंकने की क्षमता रखती है.
एक मंत्री महोदय अभिनेता शाहरुख खान की भूमिका वाली फिल्म ‘चक दे इंडिया’ की सफलता से इतने अधिक प्रभावित हैं कि वे प्रधानमंत्री को भी यह फिल्म देखने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि प्रधानमंत्री भी वक्त निकाल कर यह फिल्म देखेंगे। ये मंत्री महोदय हैं पीमओ में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान. उन्होने जब से यह फिल्म देखी है वे अभिभूत हैं। इस फिल्म के बारे में उनक कहना है कि यह फिल्म प्रेरणादायक है हॉकी खेल में जान फूंकने की क्षमता रखती है.
गौरतलब है कि जब यह फिल्म बनाने की योजना बनायी जा रही थी तब पृथ्वीराज चौहान खेल मंत्रालय के मुखिया हुआ करते थे. चौहान इस फिल्म की योजना से इतने अधिक प्रभावित थे कि फिल्म की शूटिंग के दौरान ही अपने कई दोस्तों के साथ नेशनल स्टेडियम पहुंच गए. तब उन्होंने अधिकारियों को इस फिल्म के निर्माण में योगदान करने का निर्देश दिया था.
उनका कहना है कि इस फिल्म ने हॉकी को सुर्खियों में ला दिया है. फिल्म के कलाकारों ने इसमें अच्छा काम किया है. इसमें शाहरुख का प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ रहा है. मैं चाहता हूं कि प्रधानमंत्री भी यह फिल्म देखें. प्रधानमंत्री मनमोहन भले ही फिल्मों के अधिक शौकीन नहीं रहे हैं लेकिन उन्होंने पीमओ में अभिनेता संजय दत्त की भूमिका वाली फिल्म लगे रहो मुन्नाभाई देखी थी. प्रधानमंत्री ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जिंदगी पर बनी फिल्म भी देखी थी.
जाहिर खेल विषयों पर बनी ऐसी फिल्मों से खेल प्रेमियों एवं खिलाडियों का उत्साह बढेगा. मैं एक बार फिर 'चक दे इंडिया' की टीम को बधाई देता हूं.
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